Thursday, December 27, 2018

दुनिया के लिए पुलिस की भूमिका नहीं निभा सकते, बाकी देश भी जिम्मेदारी समझें: ट्रम्प

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प बुधवार को अपनी पहली यात्रा पर इराक पहुंचे। इस यात्रा के बारे में खुलासा नहीं किया गया। ट्रम्प इराक में मौजूद अमेरिकी फौजों को देखने अचानक ही पहुंच गए। ट्रम्प ने कहा कि अमेरिका दुनिया में पुलिस की भूमिका नहीं निभा सकता। बाकी देशों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी।

सीरिया से फौज वापस बुलाना सही फैसला
ट्रम्प ने बगदाद के मिलिट्री बेस में कहा कि युद्धग्रस्त सीरिया से अमेरिकी फौज वापस बुलाने का फैसला सही है। अमेरिका पर दोबारा आतंकी हमले के सवाल पर ट्रम्प ने कहा- अगर ऐसा होता है तो नतीजे भयावह होंगे

ट्रम्प के मुताबिक- अमेरिका पर सारी दुनिया का बोझ डाल दिया जाए, यह सही नहीं है। हम बाकी देशों खासकर तुर्की से भी सेनाएं वापस बुला लेंगे। सीरिया में आईएसआईएस के बाकी ठिकानों के खत्म होने के बाद सऊदी अरब वहां विकास के कामों के लिए निवेश करेगा।

अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा- सीरिया छोड़ने के लिए सेना के जनरलों को 6 महीने का एक्सटेंशन दिया गया है। तुर्की राष्ट्रपति रीसेप तैयप एर्दोआन से अच्छी बातचीत हुई है। वह भी तुर्की से अमेरिकी फौज के भेजे जाने पर सहमत हैं। दूसरे देश भी ऐसा ही करेंगे क्योंकि हम उनके इलाके में हैं। उन्हें इस पर आने वाले खर्च को हमसे साझा करना चाहिए।

ट्रम्प ने पिछले हफ्ते ही सीरिया से फौज बुलाने का अचानक ऐलान किया था। सीरिया में रह रहे 2 हजार अमेरिकी सैनिक धीरे-धीरे घर लौटना शुरू हो गए हैं। हालांकि ट्रम्प के इस फैसले के विरोध में रक्षा मंत्री जेम्स मैटिस इस्तीफा दे चुके हैं।

ट्रम्प ने कहा था- हम नहीं चाहते कि कोई अन्य देश हमारा इस्तेमाल करे या फिर हमारी मिलिट्री उनकी रक्षा करे। वे इसके लिए कुछ खर्च नहीं करते। आईएसआईएस की हार हो चुकी है। सीरिया से फौज को वापस लौटना ही चाहिए।

भास्कर को दी दुआएं

गुलज़ार के साथ मंच पर बातचीत हिन्दुस्तान के मशहूर थियेटर निर्देशक सलीम आरिफ कर रहे थे। सलीम ने जब उनका स्वागत किया तो उन्होंने सबसे पहले दैनिक भास्कर को दुआएं दीं। कहा, मेरी दुआएं दैनिक भास्कर के साथ है। दैनिक भास्कर की थीम है आर्ट एंड कल्चर और बेवजह नहीं है कि वह हिन्दुस्तान का नंबर एक अखबार है। सलीम आरिफ ने जब उनसे सवाल पूछा कि आप नज़्म के विषय कैसे चुनते हैं? वह क्या बात होती है जब आपको लगता है कि नज़्म कही जाए? इसके जवाब में गुलज़ार ने कहा कि सच यह है कि नज़्म कहना क्राफ्ट है। एक मीडियम है कहने का। विषय नज़्म की वजह से नहीं होता नज़्म विषय की वजह से होती है। जैसे हांडी को चूल्हें पर रखा है तो वह उबलेगा ही, मैं भी चूल्हे पर रखी हांडी हूं। अपनी बात कहने का मेरा मीडियम नज़्म है।

आपकी यादें, आपको कुरेदती हैं

सलीम ने फिर सवाल किया कि आप की नज़्म है- आओ फिर नज़्म कहें दर्द को याद करें... गुलज़ार ने इसे कुछ यूं कहा- ये नास्टेल्जिया है, आपकी यादें हैं जो आपको कुरेदती हैं। जब आप उसे बयां करना चाहते हैं तो वह एक लकीर के रूप में सामने आती है। वह दर्द बार-बार मजबूर करता है नज़्म लिखने के लिए। उन्होंने बड़े ही खूबसूरत अंदाज में बताया कि नज़्म मुझे क्यों परेशान करती है। नज़्म से अपने जुड़ाव को उन्होंने अपने इन शब्दों में बयां किया - मैं नज़्में ओढ़ कर बैठा हुआ हूं....  इसके बाद नज़्में सुनाने का जो दौर शुरू हुआ वह अगले दो घंटे यानी करीब नौ बजे रात तक चलता रहा। उन्होंने अपनी नज़्मों में नेचर, मोहब्बत, इंसानी जज्बात, बुढ़ापा,  अखबार, किताबों समेत कई विषयों को समेटा। किताबों को लेकर कहा- किताबें झांकती हैं बंद आलमारी के शीशों से, बड़ी हसरत से तकती हैं, महीनों अब मुलाकातें नहीं होती...।

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